सतलुज दरिया के किनारे हरियाली, लहलहाते खेत, कहीं धूल, कहीं जंगल। यह अद्भुत व मनमोहक नजारा, उन ग्रामीणों के लिए तो कोई नया नहीं था, जो बरसों से इस नजारे के आसपास रह रहे थे, लेकिन उस व्यक्ति के लिए यह नजारा वास्तव में अद्भुत था, जिसने यहां एक शहर बसाने की सोची। वैसे कोई शहर बसाया नहीं जाता। अलग-अलग शहर खुद ही बस जाते हैं, लेकिन उसमें किसी न किसी व्यक्ति का हाथ, सहयोग और समर्पण जरूर होता है। ऐसे ही एक शख्स थे, वंस एग्न्यू यानी पैट्रिक वंस एग्न्यू। वंस एग्न्यू तो उनका सर नेम था। उनका असली नाम था, पैट्रिक एलेक्जेंडर। सर नेम मिलने के बाद उनका नाम पैट्रिक एलेक्जेंडर वंस एग्न्यू पड़ गया। वंस एग्न्यू एक ऐसे ब्रिटिश अधिकारी थे जो पंजाबी भाषा का भी ज्ञान रखते थे। उनका फाजिल्का को बसाने की राह में अहम योगदान है। फाजिल्का के इतिहास में बंगले की दास्तान के जिक्र दौरान मुसलमान फजल खां बढ़ू के नाम के साथ वंस एग्न्यू का जिक्र जरूर होगा। पिता के नक्शे कदमों पर चलकर ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने वाले वंस एग्न्यू बंगाल सिविल सर्विस में तैनात हुए।
इसके बाद उन्हें भटियाणा में सहायक सुपरिटेंडेंट के पद पर तैनात किया गया। वह एक सिपहसालार अधिकारी की कला में माहिर हो गए। हालांकि उनकी आयु कम थी। मगर ब्रिटिश अफसरों में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा। उनका मनपसंद काम शहरों को आबाद करना। वह जहां भी गए। शहरों के विकास में उनका अहम योगदान रहा। बात चाहे फाजिल्का की हो या लाहौर की। वह तीन बातों में इतफाक रखते थे, पहली बात किसी चीज को आरंभ करने के लिए सही जगह क्या है? दूसरा किन लोगों को मिलना या सुनना चाहिए? उनके जहन में तीसरी बात यह थी कि सब से महत्वपूर्ण कार्य क्या है, जिसे प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। इस सोच को आधार मानकर ही उन्होंने फाजिल्का शहर बसाने में प्राथमिकता से काम किया।
